ख़्वाबों की उड़ान

ख्वाब बस इतना ही था, के एक ख्वाब हो पलकों पे
जिसके बोझ से ये आँखें, रात को बंद तो हो

जो कदम रखा इस ख़्वाबों के बाजार में, तो आँखों की नमी कुछ यूँ रूठी
के इन दबी पलकों के साए में, ज़िन्दगी चहक उठी

मगर इस ख़्वाबों की लुका छिपी में, कदमों की उड़ान इतनी बढती चली गयी
के अब ये पलकें असमंजस में हैं, के ये ख़्वाबों का बोझ है या उड़ान की थकान

आज दिन की लालटेन बुझाते हुए, ये थकान कह पड़ी ख़्वाबों से
कि अब जिद न कर, आ छोड़ चलें इन अलसाई पलकों को

इस ख्वाब और थकान की लड़ाई में अब मैं इस इंतज़ार में हूँ
के कब ये ख्वाब टूटें कब ये थकान मिटे

और मैं सुनहरी धूप की चादर पर लेटे ये कसम लूं
के ख़्वाबों के पुल का सफ़र अब मंजिल ही तय करे तो बात बने
पलकें किराए पर देने का मौसम अब एक किताब बन चुका है

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Shashank said...
on  

Soo tha yu dokkerbhai? Last line was deep....nice to see you dabble with Hindi, the expressions have come out brilliantly at points. :)